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श्रद्धा का बाप, मेरा दोस्त शक्ति कपूर – अली पीटर जॉन

अली पीटर जॉनताजा खबर

मुझे वाकई पता नहीं कि मुझ जैसे संघर्ष रत व्यक्ति ने किस तरह कई अन्य संघर्षरत व्यक्तियों का ध्यान आकृष्ट किया होगा जो बॉम्बे (बॉम्बे को उन दिनों मुंबई नहीं कहा जाता था) में लेखक, गीतकार, कहानीकार या फिर एक्टर बनने आए थे। हमारे संपादक इस जूझने वाली योग्यता के प्रति इतने सम्मोहित थे कि वे सारे स्ट्रग्लरों को इंटरव्यू देने के लिए मेरे पास ही भेज देते थे और उन्होंने स्क्रीन का एक पूरा पेज ही इसके लिए मुझे दे दिया था। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आज जो भी फिल्म या टीवी जगत में पिछले 25 वर्षों से नाम कमा रहे हैं वह कभी ना कभी, स्क्रीन ऑफिस के एक कोने में सजे मेरे टेबल से होकर जरूर गुजरे होंगे। उस वक्त मैं सबसे युवा रिपोर्टर था और लोग मुझे बच्चा रिपोर्टर कह कर पुकारते थे। एक सुबह इन्हीं स्ट्रग्लर्स में से एक युवक मुझे ढूंढते हुए वहां आए उन्हें उन्हीं की तरह किसी संघर्षरत ने मुझे रेफर किया था। उसने बताया कि उनका नाम सुनील कपूर है और उन्हें देखकर मुझे अंदाजा हो गया था कि वे आगे बढ़ने के लिए महत्वाकांक्षी है। उन्होंने बताया कि वे एक मुस्लिम धार्मिक फिल्म ‘दयार ए मदीना’ साइन कर चुके हैं। हमारे अखबार के नियम के अनुसार, हम किसी के बारे में तब तक छाप नहीं सकते जब तक उसके पास फिल्म साइन करने का कोई प्रमाण ना हो। सुनील के पास ऐसा कोई प्रमाण नहीं था लेकिन उसने अपना टिफिन बॉक्स निकालकर कहा कि वे वही बैठे रहेंगे, ऑफिस या कैंटीन में खाना खाएंगे और पूरा दिन यही बिताएंगे, जब तक कि मैं उसे यकीन नहीं दिला देता हूं कि मैं उनकी न्यूज स्क्रीन के मुख्य पृष्ठ में छाप दूंगा। वे अपनी धुन के पक्के निकले और वहीं बैठे बैठे उन्होंने स्क्रीन के सारे स्टाफ के साथ दोस्ती कर ली और आखिर अपनी वह न्यूज स्क्रीन में छपवा कर ही दम लिया। वे तब तक नहीं माने जब तक हमने स्क्रीन के फ्रंट पेज का रफ प्रूफ उन्हें दिखा नहीं दिया, जिसमे हमने छपा था ‘सुनील कपूर साईंड’ जिसे देख कर वे खुश हो गए और मुझे मेरे घर तक लिफ्ट देने के लिए तैयार हो गए, अपनी सेकेंड हैंड कार में, जिसे उन्होंने कुछ एक्सपर्ट्स के कहने पर दिल्ली से खरीदी थी, उन लोगों ने सुनील को यकीन दिलाया था कि किसी भी स्टूडियो या ऑफिस में दाखिल होने के लिए कार का होना पासपोर्ट होने जैसा था क्योंकि इसे स्टेट्स सिम्बल माना जाता है।

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सुनील कपूर ने कुछ और फिल्में साइन की, जिसमें से एक प्रसिद्ध फिल्म मेकर अर्जुन हिंगोरानी की फिल्म थी। ये वही फिल्म मेकर थे जिन्होंने धर्मेन्द्र को पहला ब्रेक दिया था फिल्म ‘दिल भी तेरा, हम भी तेरे’ में।

अगली बार सुनील ने स्क्रीन में सिर्फ न्यूज ही नहीं बल्कि एक पूरा इंटरव्यू छपवाने के लिए पिछली बार की तरह ही टिफिन लेकर सारा दिन मेरे पास ऑफिस में बैठने की धमकी दे डाली और फिर से मुझे जुहू तक अपने कार में छोड़ने की पेशकश की। फिर जुहू में हम दोनों ने कुछ ड्रिंक्स लिए, इस तरह हमारी दोस्ती शुरु हुई। बतौर हीरो सुनील की गाड़ी पटरी पर ठीक से चल नहीं पा रही थी। उसी तनाव पूर्ण वक्त में उन्हें फिल्म ‘रॉकी’ ऑफर हुई जिसमें सुनील दत्त अपने बेटे संजय दत्त को बतौर हीरो लॉन्च कर रहे थे। सुनील दत्त को यह युवा सुनील, अपनी फिल्म के विलेन के रुप में पसंद आ गए लेकिन उन्होंने सुनील से अपना नाम बदलकर शक्ति कपूर रखने के लिए कहा क्योंकि एक ही फिल्म में दो सुनील का होना उन्हें सही नहीं लग रहा था। इस तरह सुनील कपूर शक्ति कपूर के नाम से फिल्म ‘रॉकी’ में बतौर विलेन साइन हो गए और फिर जैसे उन्हें भी सही रास्ता मिल गया। उन्हें यह एहसास हो गया कि बतौर विलन उनका भविष्य उज्जवल है बनिस्पत हीरो के जिसके लिए सैकड़ों युवा सालों से इंतजार कर रहे थे और वो इंतजार कई बार बेकार जाया भी हो जाता था।shakti kapoor

‘रॉकी’ के रिलीज ने ना सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री को संजय दत्त के रूप में एक नया हीरो दिया बल्कि दो नए विलन, शक्ति कपूर और गुलशन ग्रोवर भी पेश किये। रॉकी से शक्ति कपूर का भविष्य सशक्त बनना शुरू हुआ और देखते देखते वे एक बेहद लोकप्रिय युवा विलन बन गए। वे एक ऐसे विलन के रूप में ज्यादा मशहूर हुए जो किसी भी फिल्म में डर्टी से डर्टी विलन बनने के लिए कुछ भी कर सकते थे।

फिर जब मुंबई में साउथ फिल्मों की लहर ने इंडस्ट्री को लपेट लिया और जितेंद्र, ‘गॉड इन वाइट’ के रूप में लगभग हर साउथ के फिल्मों के नायक बन गए तो शक्ति कपूर प्रेम चोपड़ा गुलशन ग्रोवर यह सब भी उसी साउथ लहर में चमकने लगे। शक्ति इन फिल्मों में खतरनाक विलन के रूप में माहिर हो गए और कई बार तो पाँच शिफ्टों में काम करते हुए मुंबई, अहमदाबाद, हैदराबाद आंध्र प्रदेश में आने-जाने लगें। इन्ही दिनों उन्होंने 500 से ज्यादा फिल्में करने का दावा किया और घर घर में लोकप्रिय हो गए, भले ही यह लोकप्रियता उन्हें एक गंदे बदमाश विलन के रूप में मिली, लेकिन ‘बदनाम भी होंगे तो क्या नाम नहीं होगा?’ यह उनकी फेवरेट कहावत बन गई थी। उनका वो लोकप्रिय जुमलाshakti kapoor

‘आऽऽऽऊऽऽऽ’ भी उनकी हर जगह उपस्थिति का चिन्ह बन गया, जो उन्हें बेहद पसंद था। शक्ति के कुछ समकालीन साथी कलाकार, उनसे ईर्ष्या के कारण उनके बारे में कई विवादास्पद खबरें उड़ाने लगे ताकि उनका नाम खराब हो, लेकिन इस बात का शक्ति को बुरा नहीं लगा क्योंकि वे मानते थे कि यह सब इंडस्ट्री में काम करने का पार्ट ऑफ द गेम है। एक बार तो मुझे यह खबर भी शक्ति ने दी थी कि अब तो उनसे युवतियां ऑटोग्राफ लेने के लिए अपने अंडर गारमेंट देने लगी हैं। तब एक पल के लिए मेरे मन में यह ख्याल आया कि कहीं सफलता शक्ति के सर पर तो नहीं चढ़ गयी? पर इससे पहले कि वे इस मामले में और आगे बढ़ते अचानक साउथ इंडियन फिल्मों की लहर खत्म हो गई। उसकी चपेट में बहुत सारे कलाकार आ गए जिसमें सबसे ज्यादा जितेंद्र प्रभावित हुए और साथ में शक्ति कपूर। लेकिन तब तक शक्ति एक स्थापित स्टार बन गए थे। उन्होंने आखिर पद्मिनी कोल्हापुरे की बहन शिवांगी कोल्हापुरे से शादी कर ली और उनके दो बच्चे हुए। एक बेटी श्रद्धा और एक बेटा सिद्धांत। अब भी वे बेहद लोकप्रिय स्टार थे और हर तरह की फिल्में करने लगे थे, यहां तक कि थिएटर भी कर रहे थे। शक्ति इतने व्यस्त थे अपने काम मे की वे जाहिर तौर पर कहते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब उनके बच्चे बड़े हो गए। इन बच्चों को सही तरीके से पाल पोस कर बड़ा करने का श्रेय वे अपनी पत्नी शिवांगी को ही देते हैं।Shraddha-Kapoor with shivangi kapoor

वही बेटी श्रद्धा, एक खूबसूरत युवति के रूप में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में करियर बनाने में दिलचस्पी लेने लगी। श्रद्धा को इसके लिए संघर्ष करना नहीं पड़ा क्योंकि जल्द ही उन्हें अमिताभ बच्चन और सर बेन किंग्सले जैसे सीनियर महान कलाकारों के साथ एक फिल्म ‘तीन पत्ती’ मिल गयी। लेकिन शायद यह पत्ते ठीक से खेले नहीं गए थे, इसीलिए ताश के पत्ते की तरह ‘तीन पत्ती’ ढह गई। इस फिल्म के फ्लॉप होने से बड़े सितारों को तो कुछ फर्क नहीं पड़ा लेकिन श्रद्धा के लिए यह जरूर एक बड़ा धक्का था और उन्हें फिर से एक सही फिल्म का इंतजार करना पड़ा। ऐसी ही अवस्था में उन्होंने ‘आशिकी टू’ स्वीकार कर ली, जो ऐसी सुपर हिट हुई, कि श्रद्धा को एक नई जिंदगी मिल गई। आज श्रद्धा कपूर नए जमाने की नायिकाओं में से एक लीडिंग नायिका है जो सिर्फ एक ग्लैमर गर्ल बन कर फिल्मों में काम करते रहना नहीं चाहती बल्कि बतौर एक्ट्रेस वो अपना लोहा मनवाने पर तुली हुई है, जिसकी बानगी उन्होंने विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘हैदर’ में जता दी है। अब तो वे अपनी हर फिल्म बहुत चुन कर साइन करती है। श्रद्धा कपूर एक ऐसी बुलंदी को छूने लगी है जिस पर सबको रश्क होना स्वाभाविक है, लेकिन एक व्यक्ति जो अपनी धुरी पर, श्रद्धा की कामयाबी पर खुशी और गर्व से खुशी महसूस करते हैं, जो श्रद्धा की फिल्मों के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के आंकड़े सबको बताते हुए नहीं थकते हैं वह है श्रद्धा कपूर के पिता शक्ति कपूर। एक वक्त ऐसा था जब श्रद्धा को लोग शक्ति कपूर की बेटी के रूप में पुकारते थे और आज लोग शक्ति कपूर को श्रद्धा कपूर के बाप के रूप में संबोधित करते हैं और इस पर शक्ति कपूर को कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि उन्हें यह मालूम है कि फिल्म इंडस्ट्री में वक्त कैसे बदल जाता है। यह एक सर्वविदित सत्य है, जो सबको मालूम होना चाहिए कि ‘कल यहाँ कोई और था, आज यहाँ कोई और है और कल फिर कोई और आएगा’। यह सच्चाई शक्ति और श्रद्धा कपूर दोनों ने, कभी सख्त और कभी हिम वर्षा की तरह नर्म इस इंडस्ट्री में कदम रखने के बहुत पहले से सीख ली है।